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Tuesday, October 14, 2008

प्रवासी हिमाचली अमित गुप्ता: स्वपन बडे, मेहनत कडी, तो सफलता बडी!

दोस्तों! कई महीनों की चुप्पी के बाद, मैं आपके समक्ष फ़िर आया हूँ | इस दौरान मैंने पी. एच. डी. ख़तम कर दी, और अब मैं एम. आई. टी. में पोस्ट-डोक्टोरल रिसर्च (शोध) कर रहा हूँ | दिव्य हिमाचल और माई हिमाचल के अनुरोध पर मैं अगले कुछ महीनों में आपके लिए कुछ ऐसे सफल हिमाचलियों से भेंट करवाउँगा, जिनकी सोच और समृधि से सभी युवक प्रेरणा ले सकें | आज के हमारे मेहमान मेरे आई. आई. टी. दिल्ली के सहपाठक और ग्यारह वर्षों के परम मित्र अमित गुप्ता हैं | अमित सातवीं से दसवी कक्षा तक शिमला में बी. सी. एस. में पड़े | दसवीं कक्षा में आई. सी. एस. ई. बोर्ड में वे ९३ % ले कर हिमाचल में प्रथम आए | आर. ई. सी. की परीक्षा में वह हिमाचल में द्वितीय थे, और मैं तृतीय | यूं तो आई. आई. टी. में गिने चुने हिमाचली ही पहुँचते हैं, पर सौभाग्य से चार साल हम दोनों एक ही छात्रावास के अगल बगल कमरों में रहे | दिल्ली में पढाई खत्म होते ही मैं अध्ययन और शोध के लिए अमरीका आ गया, और अमित ने मैकिंजी नामक सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी शुरू की | तीन साल भारत में कार्यरत रहे, और दो साल अमरीका में नौकरी के बाद अमित ने ऍम. बी. ऐ. छिकागो विश्वविद्यालय से हासिल किया | अब अमित फ़िर से मैकेंजी में कार्यरत हैं, और ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में रह रहे हैं |

ज्ञातव्य है की अमित के पिताश्री कर्नल डी. पी. गुप्ता रिटायर शिमला में हुए और उनकी माताश्री डॉ. रमा देवी आर. के. एम. बी. की प्रिंसिपल रहीं | उनके माता-पिता शिमला जिले में पले बड़े, और अब शिमला में बस गए हैं | अमित की पत्नी, डॉ. परिधि कपूर ने जर्मन से पी. एच. डी. की है और वह भी आई. आई. टी. दिल्ली से सनातक हैं | जहाँ अमित एक बड़ी कम्पनी में करोड़ों के हिसाब किताब वाले मुद्दों से जुड़ा रहेगा, मैं आगे भी रात-दिन शोध और अध्ययन में गुजरूँगा | दोनों को उम्मीद है की हम अपने अपने तरीके से समाज में उन्नति और प्रगति की लहर ला सकते हैं | अमित और मैंने जीवनयापन के रास्ते बेशक अलग अलग चुनें हो, पर हमारी दोस्ती सालों और फासलों में घनिष्ट से घनिष्टतर हुई है | हर हफ्ते हम एक दूसरे को फ़ोन करके हिमाचली टोन में, “महाराज - महाराज” कहते हुए बतियाते हैं | प्रस्तुत वार्तालाप भी किया तो उसी लहजे से था, पर लेखन के लिए उसको थोड़ा सजा कर पेश कर रहा हूँ |

विवेक: अमित, आपने आई. आई. टी. के लिए पढाई कब शुरू की, और पढाई कैसे की?

अमित: वैसे तो असली परिश्रम ग्यारवीं और बारहवीं में डी. पी. एस. (दिल्ली) के दिनों में किया, पर आप कह सकते हैं की नौवी कक्षा से मैंने पढाई की तरफ़ ध्यान देना शुरू कर दिया था | देता भी कैसे नहीं | नौवीं कक्षा में मैं पढाई की तरफ़ ध्यान देना काफ़ी कम कर दिया था | मेरी माँ ने मुझसे पूछा कि मैं ग्यारवीं कहाँ से करना चाहता हूँ | मुझे दिल्ली जाना था, और माँ ने मुझे एक दिन लालपानी के स्कूल कि सैर करवाई | कहा, कि अगर नंबर कम आए, तो बेटा दसवीं कक्षा से यहाँ पढ़ना पड़ेगा | कहाँ मेरे सारे मित्र बी. सी. एस. में थे, ताउम्र मैं अंग्रेज़ी स्कूलों में पढता आया था, और कहाँ दसवीं में हिन्दी में पढाई| मेरी तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी |

विवेक: माँ ने लालपानी कहा, और आपने पढाई का रुख किया?

अमित: अब बच्चे को ऐसी चुनौती दी जाए, तो वो क्यों न पूरी मेहनत जूझ पड़ेगा | बचपन में लालपानी मुझे कालापानी की तरह लगता था, और मैंने दिल्ली जाने की भी ठान रखी थी | कुछ पाने की इच्छा कई बार क्या खो सकते हैं के डर से भी ससक्ष्त हो जाया करती है | ठीक वैसे ही जैसे जब किसी बल्लेबाज को टीम से निकाले जाने की बात होती है, तो वो अक्सर शतक लगा बैठते हैं |

विवेक: लेकिन दिल्ली जाना इतना महत्वपूर्ण था क्या? पढ़ाई तो आप शिमला में माँ बाप के पास बैठ के भी कर सकते थे?

अमित: भइया दिल्ली जा कर एहसास हुआ की लोग आई. आई. टी. में पहुँचने के लिए कितनी जी तोड़ मेहनत करते हैं | अब मेरे बगल वाले कमरे में अरविंद रहता था, जो तुम्हें याद होगा अखिल भारतीय आई. आई. टी. प्रवेश परीक्षा में प्रथम आया था | आस पास के लोग अगर लगन से तैयारी कर रहे हो, तो स्वाभाविक है, की आप भी पढ़ाई में ध्यान लगायेंगे | अगर सभी पड़ोसी रोज़ गोटियाँ खेलेंगे तो शायद आप भी गोटियाँ खेलने में महारत पाओगे |

विवेक: गोटियों से याद आया कि आई. आई. टी. में आप रोज़ क्रिकेट खेलते थे | साथ में कई और गतिविधियों में भी हिस्सा लेते रहे | इसके बावजूद आपकी पढाई में कोई कमी नहीं पड़ी | इसके बारे में कुछ बताइए |

अमित: देखो भाई, हर चीज़ समय के हिसाब से करो, तो दिन में पढाई, शाम को क्रिकेट और रात में नाटक-नाच के लिए बड़ा वक्त है | यूं भी खाली दिमाग शैतान का घर होता है, और पढाई और खेल में नियम से दिल-दिमाग-शरीर सब टिच रहते हैं | वैसे इस सब में सीनियर्स की दोस्ती का काफ़ी प्रभाव था | उनहोंने समझाया की कैसे समय का सदुपयोग करना चाहिए, कैसे पढाई के साथ साथ जीवन के बाकी पहलुओं की तरह धयान देना चाहिए | और उन्ही दोस्तों ने काफ़ी सख्ती से बताया की चाहे कुछ हो, सुट्टा नहीं मारना, नशे से बचना, और यह भी बताया कि kaise लक्ष्य बना कर साधा जाता hai !

विवेक: शायद काफ़ी हिमाचलियों ने मैकिंजी का नाम भी नहीं सुना होगा | पर आई आई टी में वह सबसे अच्छी नौकरियों में गिनी जाती रही है, और आप उन चंद लोगों में थे जिनको छात्र रहते हुए ही, भारत में मैकिंजी, और एक अमरीकी कम्पनी ने चुन लिया था | उस समय के मैकिंजी के अनुभवों के बारे में कुछ कहिये |

अमित: मैकिंजी ने दोस्त मेरी आंखें खोल दी | हम भारतीय बहुत तीक्ष्ण दिमाग वाले होते हैं, पर साथ ही साथ हममें कुछ कमियां हैं | हमें सिखाया जाता है की बड़े बुजुर्ग कभी ग़लत नहीं बोलते, और आपके ऊंचे औधे पर बैठे लोगों की सही ग़लत बात को चुपचाप सुन के मान लेना चाहिए | बात लगभग सही है, पर इस वजह से हम ग़लत को ग़लत नहीं कहते | मैकिंजी में सीखा की उम्र का लिहाज़ करते हुए भी आप वाद विवाद कर सकते हैं | स्वविश्लेषण के साथ साथ हर फैसले को ठीक से जाँचना भी ज़रूरी है | जब २२ वर्ष की उम्र में मुझे बड़े अफसरों और कंपनियों के मालिकों से मिलकर अपनी बात सुनानी पड़ी तो उसके लिए यह बड़ा ज़रूरी था कि वो मेरी बात में वजन समझें, और मेरे सुझावों को इज्ज़त से देखें | आम तौर पर हम युवाओं कि बात अनसुनी कर दी जाती है, पर मैकिंजी में सीखा कि अपनी बात सुनाने के लिए आपको पहले उस मुकाम तक पहुँचना पड़ेगा, जहाँ आपका कद, आपकी उम्र से ज्यादा आपकी काबलियत बयान करती है |

विवेक: हमारे पाठकों को आपकी ‘मजदूरी’ और एम. बी. ऐ. के खरचे से अभी अवगत करा दूँ | अमित एक लाख रुपया महीना की तनख्वाह पर भारत में नौकरी कर रहे थे | अमरीका में एक समय पर वे बारह हज़ार डॉलर प्रति महीना (५-६ लाख रुपया प्रति महीना) तनख्वाह ले रहे थे | दो साल की एम. बी. ऐ. के लिए लगभग ६० लाख रुपया खर्च करने के बाद उनकी सालाना आमदनी आने वाले सालों में लगभग एक करोड़ रूपये होगी | वैसे यह रकमें मेरे लिए भी बड़ी है, क्यूंकि इस दौरान में वजीफों पर निर्वाह करता रहा हूँ, जबकि अमित देश विदेश में घूमता रहा है | अमित सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इंग्लैंड, फ्रांस, सौदी अरबिया, पोलैंड, मेक्सिको, चील, इतियादी देशों का भ्रमण कर चुके हैं | न सिर्फ़ रकमें बड़ी हैं, न सिर्फ़ देशों कि फर्हिस्त लम्बी है, न सिर्फ़ कम्पनियाँ ऊंची हैं, उनके सपने, और सपनों से जुड़ा श्रम और लगन से कमाई गयी विद्या भी भव्य हैं |

हाँ, तो अमित, आपने मैकिंजी के बाद अमरीका में दो कंपनियों में काम किया, और फ़िर ऍम बी ऐ की | देश को छोड़कर विदेश में आकर नौकरी और पढाई में आपको क्या अन्तर नज़र आया ?

अमित: अमरीका में पढाई का तरीका काफ़ी प्रक्टिकल है और घोटने के बजाये, सोचने पर बल दिया जाता है | (यह तुम ज्यादा जानते होगे, क्यूंकि तुमने ज्यादा वक्त पढाई में निकाला है)| यहाँ लोग आपकी अक्ल और काम कि कद्र करते है, और शायद मिलजुल कर काम भी बेहतर करते है | अलग अलग देशों में घूम कर, अलग संस्कृतियों के बारे में जान कर, विभिन्न देशों के लोगों के साथ काम करके जो अनुभव, जो ज्ञान आप अर्जित करते है, उसका कोई मुकाबला नहीं | इसके साथ साथ मुझे सफल, और विद्वान दोस्तों, सहपाठियों और सहकर्मियों कि संगत में हर तरह के दर्शन और दृष्टांत मिले |

विवेक: मैं जानता हूँ कि ग्यारह सालों में हमने कई किताबें एक दूसरे के कहने पर पड़ी है | इस रूचि के बारे में कुछ कहिये |

अमित: (तुम्हारे जितनी पुस्तकें तो मैंने नहीं पड़ी |) जीवन के हर उतार चढाव में, पुस्तकों ने सीख दी, मार्गदर्शन दिया और उन सभी पहलुओं को दर्शाया जो मैं अपनेआप शायद कभी न जान पाता | चाहे फ़िर गांधीजी कि आत्मकथा हो, या टोल्स्टोय का उपन्यास, हरेक पुस्तक ने मुझे लुत्फ़ और ज्ञान दोनों दिए | तुम इस विषय पर अलग से लेख क्यूँ नहीं लिखते?

विवेक: अरे, अभी सवाल मैं पूछ रहा हूँ | इत्मीनान रखो, वह भी लिखूंगा | फिलहाल यह बताइये कि आपने अपने भविष्य के लिए क्या निर्धारित किया है?

अमित: मैं भारत में वापिस जा कर फिनेंस में काम करूँगा | विदेश में हर तरह के सुख हैं, सुविधा है, परन्तु देश में माँ बाप हैं, दोस्त हैं, लोगों में अपनापन है| मेरी इच्छा है कि मैं सारे समुदाय के लिए धन और समृधि जुटा पाने का साधन अर्थात कोई कम्पनी शुरू करूँ | फिलहाल उसके लिए पूँजी इकठ्ठी करनी है | भारत में चीजों का अभाव नहीं, पर उनको सही तरह रखने और इस्तेमाल करने की आदत नहीं | जब तक हम अपनी सडकों, ट्रेनों, हवाई अड्डों, आदि मूलभूत सुविधायों को नहीं सुधारेंगे देश की उन्नति धीमी रहेगी | पर मुझे विश्वास है कि हम आने वाले सालों में तरक्की का दौर जारी रखेंगे, और हम युवा पूरे समाज को कार्यकुशल बना सकेंगे |

विवेक: अमित, अंत में हमारे पाठकों, विशेषकर युवाओं, से आप कुछ कहना चाहेंगे?

अमित: बस यहीं कहूँगा कि सपने बड़े हों, तो राहें मुश्किल तो होती है, पर जो मज़ा पर्वत कि चोटी में पहुँचने में है, जो नज़ारा चोटी से नज़र आता है, उसका मुकाबला नहीं | सपने बड़े लो, मेहनत कड़ी करो, और तारों तक ना भी पहुंचोगे, तो चाँद तो पा ही जाओगे |

3 comments:

Vivek Gupta said...

Thanks for sharing information about Amit Ji. I am very happy to see his life ambitions, goal and way of accompolishing it. This is vivek from orlando, FL. Good luck to Amit Ji and you also for such a nice interview. Please try to publish it in news paper or compile 10-12 interviews in a shape of book. That will be good helps to every youth.

Regards,
Vivek
mailtovivekgupta@gmail.com

Arpana said...

Oh baap re!! Its hard enough for me to read a line....an entire post...:-o translation pliss!!

aditya said...

hi sir,it feels very great to see himachalis doing very very good