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Saturday, November 16, 2013

To Sachin Tendulkar, my hero

My dear Sachin Tendulkar,

I bid you farewell today with a lot of emotion. I am every Indian cricket fan who watched you perform for 24 years (gloriously on days, doggedly when chips were down). I am every person who respects great accomplishments that come with honest effort, perseverance and cultured skill. I am every fan who has admired the grace and the gravity of your on the ground, and off-the-ground words and deeds. You are a worthy hero in your own right, and you have been an inspiration to all of us in more ways and on more days than can be enumerated. I so wish we had more like you in every field. There is more to write and say but we will leave that for another day, as great emotions leave little room for words.

Thank you for every burst of hope and inspiration to provided to me and the nation, and for a career full of accomplishment.

Regards
Vivek

Saturday, August 31, 2013

In English

Do we, westernize desi sentiments, when we write in English?
Do we, our longings, appear bastardized or contrite in English?


I concur, puns lack the cultural context. Metaphors lack that bite.
Don't we Indians suffer from a self-imposed exile in English?


In Hindi and Urdu lie the battles of Sanskrit and Farsi roots,
I escape Indian divisions but territorial wars I fight in English.


More Indians speak/read it, than Americans plus British do.
Why is the universe surprised if I choose to delight in English?


Blacks, Southerners speak in drawl, British have an accent!
Should I worry if we can't count syllables right in English?


Can I become a revered poet-prophet without writing in Hindi?
Even my mother insists, I sound foreign, uptight in English.


Restrain, veils, euphemisms, religious propriety, traditions:
I break chains; let my Muse celebrate her respite in English.


Even the most illiterate in the East sing verses of the great poets.
I seek that ideal, immortality. Can I scale that height in English?


For ten centuries, the East has glowed in the candlelight of Ghazals.
Vivek blazes with the passions Shahid too sought to ignite in English.


--

Published first in Contemporary Ghazals, 2013

Saturday, June 22, 2013

Seven thousand a day stillborn

-->
Seven thousand a day stillborn worldwide
says the headline, forgetting seven thousand
a day mothers with voids in their wombs,
infected by slurs bursting like pus from hackneyed lips
of their own kin. Seven thousand a day mother-hoods
stillborn, destined to bear a viscous grief in their eyes
while their own flesh turns into a monument of mud.
Seven thousand a day fathers ushering doubt into doors
beyond which science and religion appear futile;
only an angry pain gnaws at the soul with stillborn
claws of memory. Seven thousand a day nearly-parents
resuming with a dreadful rancor, a bitterness unmitigated
by gossip, tv, cricket, a fury concealed within their breasts.
The countless aunts, uncles, cousins and neighbors keep
reminding them that pity has a tenor which like a rake
keeps scratching at the surface, while the worms of sorrow
penetrate the deeps within. Seven thousand a day questions
forsaken by an age-old habit of accepting a stillborn future
as fate. Seven thousand less is like an absent ripple
unnoticed by the ocean that sloshes and surges; the shells
and sand left in its wake become new ground for feet to sink in,
for hands to build fragile dream-houses, and forget
how each day, seven thousand disappear without a word
or a smile or a tear. Seven thousand a day stillborn souls
recalled to the base-station or wherever they come from.
While two-and-a-half million per year retreat without a syllable,
to have each one of us alive, day after day, isn't it, a miracle? 

**

Appeared first in Reading Hour, July-Aug 2012.

Friday, June 21, 2013

Nadi, Baandh, Baad Aur Kavi : नदी, बाँध, बाड़ और कवि

नदी, बाँध, बाड़ और कवि 

1.

हिमाचल, हिमालय का सौंदर्य मात्र चोटियों में नहीं 
उसकी घाटियों और वादियों में है 
उसके जंगलों, मंदिरों, निवासियों से है
घाटियों में घर हैं, घरों में स्वपन और घाव हैं 
फाके और चाव हैं, कूलें, चूल्हे और गाँव हैं 

और मध्य तेजधार, रफ़्तार, होशियार नदी 
बलखाती, मुड़ती, फिर मुड़ती, नदी 

नदी चली रचती, चुनती आकृतियाँ उस स्मृति की
जो बरसे, बहते जल से कहे, जा तेरी राह सही
नदी नाद वाली, संवाद वाली, दादा की दाद वाली
चावल के खेत वाली, बजरी और रेत वाली
नदी देवों के वरदान वाली, 
जन्म और शमशान वाली
भैंसों के जमघट वाली, 
बाट वाली, घाट और घराट वाली

और यह क्या भव्य भवन-सा उठ रहा उसके हृदय में, 
रुद्ध कर रहा उसका स्वर, जो चट्टानें 
बिखरा देती थी उसकी उन्मुक्त लहर
अब मौन 
क्यूँ है? 

**

2.

डूब गयी हर घाटी,
बाँध दीया गति को कैसे, मानव की यह मति है कैसे
अब कहाँ से आये और जाए किधर, पूछे नदी 
क्यूँ, किसी व्यक्ति से कैसे?


डूब गयी हर घाटी, 
और हर बाँध के आगे नदी सूखी-सी
क्षीण-सी चली, बादल तक भटक गए, 
और धरातल के गर्भ के भीतर दरारें,
दरारों में आये हैं हलचल के उपक्रम नए,
पहाड़ों के देवों तक में जागे हैं अब भय, भाव नए,

डूब गयी हर घाटी,
लो निंगल ले गया बाँध जंगल, 
आया अब अप्राकृतिक सरोवर,
लीन, जलमगन यादों के मधुवन, 
अब विद्युत अद्भुत चमकेगी दूर 
और जुगनू सारे संशय में हैं, 
पक्षी, पशु अनकहे भय में हैं |

***
3.

किस समृधि क्या ध्यान धरते हो मित्र,
कैसे निर्मित करते हो संभावनाओं  का चलचित्र, 
कैसे जानते हो कि नदी नहीं प्रहार करेगी, 
अपनी प्रकृति से स्वयं अपने अधिकार का
क्यूँ नहीं वह हलचल से, भूकंपन से, बाड़ की आड़ में,
क्यूँ नहीं वह अपनी धमनियों के रोड़ों का उपचार करेगी ?




***

4.

पर कवि तुम क्यूँ प्रगति में हलाहल देखा करते हो?
प्रगति विद्युत से है, विद्युत बाँध से है, 
विद्युत से प्रकाश है, प्रकाश में बैठे तुम लिखते हो
क्यूँ बाँध में आतंक देखा करते हो?
क्या वैज्ञानिक, अभियंता-इंजीनियर बाबु ग्यानी नहीं?
बाँध निर्माताओं-कंट्राक्टटरों, इंजीनियर बाबुओं के प्रणेता 
कोई और नहीं, चुनाव के चूर्ण जो समाजसेवी नेता हैं, 
उनको भी अपनी जनता, जन्मभूमि का चेता है,
प्रगति विद्युत से है, विद्युत बाँध से है, 
पर कवि तुम क्यूँ प्रगति में हलाहल देखा करते हो?

कहूँ, क्यूँ मुझसे कवि-बुद्धिजीवी 
समस्याओं का व्याख्यान करते हैं,
उन्हें सुलझाने का प्रयास करते हैं?
ज्ञान आये अध्ययन, मनन, चिंतन, तपस से, 
प्राण-प्रेरणा, अंतरात्मा की उपज से,
और हम सीख सकते हैं अतीत से, दूसरों की 
आपबीती से, वैज्ञानिकों की रीती से ।
कहूँ, क्यूँ कवि भविष्यफल का तर्क दे
या भूत की कथनी का आह्वान कर, 
दूसरों के लिए सही-गलत गुनते हैं?
कवि की कृति - पुरुष और प्रकृति, हृदय और मति,
लोकनृत्य और संस्कृति, भविष्यदृष्टि और स्मृति -
की है एक झलकी, धुन, खनक, मूर्ति, सूक्ति, संवाद-सी 
जो देख, कह, सोच, सुन, गा न पाए कोई
वह अक्षरों और सुरों में बिंध जाए कवि ।

हाँ सुना हमने भी पुरखों से कुछ ऐसा ही है कवि,
पर वाल्मीकि की दिव्य-दृष्टि कहाँ कलयुग में पनपेगी,
वाद छोड़ो, प्रकृति-पुरुष की सोचो,
प्रगति की सोचो, विद्युत बाँध से है, 
कवि तुम क्यूँ  प्रगति में हलाहल देखा करते हो?
सोचो मित्र, सरकार, नेता कर रहे हैं इतना व्यय
तो बाँधों में लाभों का पुलिंदा होगा, 
सरकार ने सब कुछ सोचा होगा 
क्या तुम क्या स्वयं को सही, 
उन्हें असक्षम समझते हो?
तुम बस बैठे बैठे मुद्दे कुरेदा करते हो, 
प्रगति में दुर्गति डकेला करते हो 
कहो कैसे इन परिवर्तनों की, 
तकनिकी बारीकियों की बाते समझते हो?
या ऐंवें ही, प्रगति में हलाहल देखा करते हो?

**

5.

मेरी बात सुनो,
मैं वैज्ञानिक-गति का चिंतक, 
निःस्वार्थ सत्य-दृष्टा, सजग,
मानवीय ज्ञान का महासागर,
तुम्हारी अंतरात्मा में बसा
महामुनि हूँ ।

मैं हर पहलु को परखता हूँ, पहाड़ों की नींव, 
नदी के बदलते तीर, चट्टानों की चपलता,
वर्षा के सारे आंकड़े, भूगर्भीय दरारें, दर्द, 
दबाब, द्रव्य, और भ्रष्टाचार की आय,
सम्पूर्ण मानवता की तकनिकी शिक्षा, 
भौतिकी और पदार्थ विज्ञान के ज्ञान के दम पर,
निःस्वार्थ लेखनी, कृति के स्वाभिमान के उद्यम पर,
मैं शुभचिंतक, महामुनी करता हूँ आंकलन 
तो इन पहाड़ी प्रान्तों  की धमनियों पर बंधते 
मानवीय अदूरदर्शिता के स्मारकों से डूबे हुए
बिलासपुरों से पलायन करते हुए क्षुब्ध, 
भूमिहीन कृषकों से स्वयं को एक मत पाता हूँ,
जल के बल, थल के नीचे की हलचल, 
और नदियों में बड़ते मानवीय हलालाल
और कर्मों से उत्पन्न होने वाले क्षय और प्रलय 
के भय से 
अपने को खिन्न, चिंतित, आकुल, आशंकित, 
असहयोगी, विवश, विद्रोही-सा पाता हूँ,

प्रगति, उन्नति, समृद्धि का गान 
मैं भी सुनाता हूँ, पर कुछ विकल्पों को,
डगमग या अनभिज्ञ नीति, स्वार्थी, 
संकीर्ण या भ्रष्ट राजनीति के संकल्पों को,
प्रान्त, जन्मभूमि, धरा के प्रति, 
पूर्वजों, प्रियजनों, आनेवाली पीड़ियों के प्रति
संभवतः हानिकारक, अहितकारी क्रिया-कल्पों को,   
विवेक की कसौटी पर रखता हूँ, 
सृष्टि की सुख-शांति के लिए अनुचित 
आचरण, विचारण को तजता हूँ
और छेड़ कर तार सभी भावनाओं के, 
मस्तिष्क की संभावनाओं के,
जन-जन के उत्थान, मुस्कान, 
मोक्ष के लिए उपयुक्त विकल्प चुनता हूँ |    

मेरी बात सुनो,
मैं वैज्ञानिक-गति का चिंतक, 
निःस्वार्थ सत्य-दृष्टा, सजग,
मानवीय ज्ञान का महासागर,
तुम्हारी अंतरात्मा में बसा
महामुनि हूँ ।

**
6.
हिमाचल, हिमालय का सौंदर्य मात्र चोटियों में नहीं 
उसकी घाटियों और वादियों में है 
उसके जंगलों, मंदिरों, निवासियों से है
घाटियों में घर हैं, घरों में स्वपन और घाव हैं 
फाके और चाव हैं, कूलें, चूल्हे और गाँव हैं 

और मध्य तेजधार, रफ़्तार, होशियार नदी 
बलखाती, मुड़ती, फिर मुड़ती, नदी 

यह थम गयी तो मिट जायेगी सारी वनस्पति,
घाट भी, घराट भी, और मानव समाज भी,
और फिर न कोई अराधन, कोई समाधि जल को
ला पाएगी भागीरथी के रूप में धरातल को,

है
कहीं बची 
श्रधा जो मनुपुत्र को दिशा देगी?


**
(2011 में विवेक शर्मा रचित अधूरी कविता पर अनूप सेठी जी और अवनीश कटोच जी की टिप्पणियों का आभारी हूँ )

Sunday, May 12, 2013

Maa ki Buni Swaaterein -- माँ की बुनी स्वाटरें

माँ की बुनी स्वाटरें  
      - विवेक शर्मा

मासिक तनख्वाह मिलती, पर हफ्ते भर में
फाकों की फरहिस्त छुपाने के लिए माँ
स्वाटरें बुन-बुन कर बेचा करती |

एक अफसर की बीबी के हाथ 
इमानदारी की बस एक अंगूठी आई 
और बर्तनों की सफाई, कपड़ों की धुलाई 
करते हुए भी, झाग तक का हिसाब करके
फाकों की फरहिस्त छुपाने के लिए माँ
रद्दी के बदले मिले नोटों से ऊन खरीद 
स्वाटरें बुन-बुन कर बेचा करती |

शिक्षा के स्वपन अधूरे लिए जब मेरी माँ
एक पिताविहीन चौथे दर्जे के मुलाजिम 
से ब्याही, तो नाना बड़ी संवेदना से बोले:
लड़का गरीब है, होनहार है, होशियार है,
अब तेरे संस्कार उभरेंगे, तो दोनों उभरोगे |
पिता ने कलर्की की, वनस्पति, पुष्प-फल विभाग,
तुइशन पढ़ाई और सुबह से नींद चुराकर यदा-कदा
लिख पढ़ कर, एक दिन प्रदेशस्तर 
इम्तिहानों में अव्वल आकर
खुद को अफसर कर लिया, 
और हर सीड़ी की संगिनी 
फाकों की फरहिस्त छुपाने के लिए माँ
स्वाटरें बुन-बुन कर बेचा करती |

मैं आया निस्स्वर, हाँ, 
न रुदन, न स्मित-रेखा, 
न सांस ही साथ लाया, 
यह दिए और सब स्वपन भी तो
दोनों ने हर यत्न से मुझको दिए 
सब साधन, जीवन | 
भाइयों और बहनों की पढ़ाई, विवाह 
सब थे पिता ने धर्म समझे, 
सो सहधर्मिणी स्वयं की सारी कामनाएं 
स्वाह करके, खुद फाकों में निर्वाह करके,
निभाती गयी फ़र्ज़ जो मेरे पिता ने धर्म समझे,
और दोनों ने मेरे लिए चाहे 
संघर्ष से मिल सकने वाले सारे ध्येय,
और किशोर भी नहीं था जब जान चुका था 
मेरी हर कृति, उन्नति का पुष्प 
उस व्रतधारिणी की समूची आराधना 
और पिता के लहू-पसीने से पल्लवित हुआ है, 
किशोर भी नहीं था जब जान चुका था 
फाकों की फरहिस्त छुपाने के लिए माँ
अनेकों रंगों, डिजाइनों, फैशनों में तैयार
स्वाटरें बुन-बुन कर बेचा करती |

वर्ष धीरे धीरे ढलते है, पर किशोर युवा होते ही
बहुत तीव्रता से घर से दूर निकलते हैं,
मैं परीक्षाओं के हल सैंकड़ो सवाल करके 
होशियार निकला घर से कुछ कर दिखाने के विचार करके
उधर पिता ने अपनी पीड़ी और उसके पहले के प्रति सब कृत्य 
रीती-रिवाज़ से मुताबिक़ अपनी तनख्वाह के अधिक
माँ की बंध मुट्ठी विश्वास के सहारे पूरे कर दिए
मैं यूँ तो निकला था घर से कुछ कर दिखाने के विचार करके
पर मोह मुझे था खींच रहा और मैं, स्वार्थी, एक कामिनी के
जीह्वा से सस्वर हुए हर इच्छित खर्च को 
जीत कर कोई नवाबी ख्याति क्या पाना चाहता था ?
फरवरी का ज्वर बड़ा, बीते मार्च, सावन और सितम्बर
फिर कार्तिक आया, कोहरा जाने छाया कि हटा 
जब आधी-बाजू वाला बुना स्वाटर पहनते ही 
स्मरण हो आया कैसे आजीवन अब तक 
फाकों की फरहिस्त छुपाने के लिए माँ
बिना थके, बिना रुके, बिना किसी से सुने-कहे 
स्वाटरें बुन-बुन कर बेचा करती |

युवा बहुत तीव्रता से घर से दूर निकलते हैं,
मैं भी गया हूँ दूर इतना के इन जिलों में
हाथों से बुनकर पहने जाने वाले स्वटरों का रिवाज़ नहीं
पर याद करता हूँ कि माँ के हाथों को था आराम नहीं, 
अब बुनाई नहीं है, कोई कमी नहीं है, पर माँ के निकट
रह पाना इस सदी में आसान नहीं, सो हर वर्ष
सर्दी की तहों से खींच कर एक काला और एक भूरा
एक पूरी बाजू का, एक आधी का, हाँ, यह वही भूरा है
जो मेरे कालेज के आखिरी वर्ष में माँ ने जब बुना 
पिता को भा गया, माँ का हृदय उन दिनों
था हर बात पर बाप-बेटे के सिल-बट्टे में पिसते 
घिसते रिसते अरमानों और ख्यालों की तरह,
पर मैं देश से दूर चला, तो चुपचाप पिता ने 
एक तह कर तनाव को उस घर से दूर कर दिया,
और मैं कर आया प्रण यह कि जब श्रेय से
पूज्य कर दूंगा उस दंपत्ति की स्मृति को,
हाँ आधी बाजू का यह भूरा स्वेटर पहन 
अकसर उन उधेड़-बुनों का विस्मरण करता हूँ,
कैसे फाकों की फरहिस्त छुपाने के लिए माँ
स्वाटरें बुन-बुन कर बेचा करती |

वाक्य हैं बस, वाक्य हैं, मात्र शब्द, 
रोगशय्या पर माँ है, बेटा कहाँ है 
हाथों में माँ के बस ऊन के कारवां 
के निशान हैं, बेटा कहाँ है,  
क्या वह अपने माता पिता की सच्ची 
संतान है? बेटा कहाँ है?
दूर जाना तय था यह जन्म से ही, क्यूंकि बेटा
एक संघर्ष की ही तो संतान है
अब नए जलूसों में धक्के खाता अरमान है,
पर एक शुद्ध सदा उसके मन में भावना है,
ईमान की सब देशों में रहती कोई माँ है
जिसके हाथों में बस ऊन के कारवां हैं 
दर्ज़नों को देती वह स्नेह की ऊष्मा है,
गम-चुप गलियों में उसका छुपा ब्यान है,
ईमान की सब देशों में रहती कोई माँ है
फाकों की फरहिस्त छुपाने के लिए माँ
स्वाटरें बुन-बुन कर बेचा करती |

सात सौ सत्तासी स्वाटरें जो अनेकों घरों में
बिखरीं हैं, मैं तलाशने निकला हूँ,
यही मेरे बचपन की स्तुतियाँ हैं,
यही मेरे यौवन की आयतें हैं,
सात सौ सत्तासी स्वाटरें जो अनेकों घरों में
बिखरीं हैं, मेरी माँ की सजीव ख्वाईशें हैं,
सात सौ सत्तासी स्वटरों की ऊन के हर रेशे में
ममता के स्पर्श की, माँ के संकल्प की 
छाप है, प्रतिध्वनी है, जयघोष है, 
ऐसा मेरे देश की विवशता है, संस्कार है,
यह मेरा नहीं कई बेटों का इतिहास है,
फाकों की फरहिस्त छुपाने के लिए माँ
स्वाटरें बुन-बुन कर बेचा करती |

--
२० १ १  में रचित 

Thursday, April 11, 2013

Apravasi Sooktiyan I -- अप्रवासी सूक्तियाँ १

आड़े-तिरछे हो कर हम
आते हैं परदेश
झुग्गी-झौंपड़ी में रहते हैं
पर कहते उसे विशेष

उदासी चाहे दिल में हो
फोन पे कौन सुनाये
दूर के दर्द दिखाई के
हम पूछें क्या उपाय

अंग्रेजी चाहे आती हो
पर गैहुआं अपना रंग
सोचा छूटेगा जाती-भेद
पर गैहुआं अपना रंग

थाली भर का खाया पर
पेट रहा खाली
तड़का पूरा मारा पर
स्वाद रहा फाकी

माटी से यह कैसा मोह
माटी है माटी
गाँव में भूखे सो
धूल ही थी चाटी

जवानी बीती फुर्ती से
बुड़ापा कलंक
न गाँव न घराती हैं
एकलो सत्संग

आड़े-तिरछे हो कर हम
आते हैं परदेश
जीवन भर मेहनत कर
पाते हैं क्लेश

महँगा यहाँ डाक्टर है
बिजी हैं माय सन
दुनिया भर के कर्जों का
टेक इस इजी माय सन

कौन रहा वहाँ पर है
तेरा जहाँ यहाँ पर है
पर माटी करे पुकार
पर माटी करे दुलार

माटी तो माँ सी है
गोद में ले बिठाए
चाहे कैसे हों  दुःख-दोष
पल में दे भुलाए

जीकर के फ़ौरन में
क्या पाए तूने सुख
गर देश में रहता
चुगता वहाँ भी दुःख

दुःख मानवीय दशा है
कुर्ता पहनो चाहे कोट
खानी होंगी चोट पे चोट
फ्रेंची पहनो चाहे लंगोट

दूर के ढोल सुहावने
दूर से फूहड़ लगे हूर
प्रतिबिम्ब कैसे देखें
अक्खियों में है धूड़

अकल आई देर से
बुड्डा हुआ बुद्धा
विदेशी ठाठ त्याग के
काठ पर बैठा

ज्ञान बड़ा घाघ है
ज्ञान से रहियो सतर्क
अच्छे खासे तर्क दे
करदे स्वर्ग - नरक

लगाये पावडर क्रीम पर
रंग बदले न ढंग
कब चूने से नहाये के
हूर  बनयो बदरंक

हल्दी के रंग और स्वाद से
पीछा कैसे छुड़ाय
जे जेनेटिक रोग-दोष
जनम से मिल जाए

विलायती खा, विलायती पी,
चाहे विलायती से ब्याह जा,
पर जब माटी पुकारे अंत काल
वापिस गाँव-घर आ जा

ज्यादा नौस्टेलजिक करेगी
खाएगी चपेड़
दिन भर ताना-बाना बुना
न रात में उधेड़

बेटा जिद न किया कर
समझाकर हम हैं अलग
नागरिक हैं हम भी बेशक
पर गैहुआं अपना रंग

जायज मांग किया कर
जो बीके-बेचे बाजार
कैसे तुझे समझाएं
यही विदेसी संस्कार

घर जाय के नबाब दिख
यहाँ चला रिक्शा
घाट-घाट पर बदल रुख
यूज़ अपनी शिक्षा

क्या खोया क्या पाया
किसके हाथ क्या आया
सोच शोक से क्या होय
गर यह सब है माया

वजूद तेरा क्या है
चिंता की भूख
जिंदगी है गन्ना चूस
चबा चबा के थूक ।


--
 विवेक शर्मा
(२ ० १ २ )

Saturday, March 30, 2013

Berangi Holi बेरंगी होली (Hindi Kavita)

यार बेरंगी बनायी इस बार होली,
न गुलाल मला, न पिचकारी मारी
न गालों पर रगड़ी आहें, निगाहें
न शोर-गुल था, न हल्ला-मोहल्ला,
बस पुराने दिनों की धुंधली चुनौती,

साहिब जी के माथे पर सिर्फ तिलक
चंचला के ठहाके और धक्-धक् धक्-धक्
मोड़ पर भांग-भरी ठंडाई, पकौड़े,
चौक पर चौकन्ने पुलसिये, छिछोरे
अब बस पुराने दिनों की धुंधली चुनौती,

कौन साल था वो कीचड़ से लथपथ
बेसुध नाले में पड़ौसी का नौकर
वो कौन घर से भागी थी रंगी स्यार-सी
क्या लोकगीत की पंक्ति थी मुझे याद-सी
अब बस पुराने दिनों की धुंधली चुनौती

वो जलती होलिका और विस्मित बच्चे
बाप ह्रिन्यकश्यप हुआ तो? सोचते बच्चे
प्रहलाद-सी अच्छाई तब भी कहाँ थी
रंग-भंग के भुलावे में तब भी जान थी
अब बस पुराने दिनों की धुंधली चुनौती

विदेशी है जीवन यादें, आहें है देसी
क्या चाव से आज हर बात होती
थके आते शाम को नहाते देर तक
नदियों में भी आज इन्द्रधनुष बसते
अब बस पुराने दिनों की धुंधली चुनौती,

वसंत की उमंग और प्रीत के सब रंग
लालिमा शर्म की, सनेह की, सनक की,
कालिख लिए मव्वाली छुपकर बैठे
घर में नजरबन्द नवविधवा और बेटे,
दूर पुराने दिनों की धुंधली चुनौती,

हर वर्ष नया हाथ, नया ढंग, नया रंग,
हर पर्व से ऊंचा हास्य, प्रीत, हड़कंप,
रंगों की रौनक तिलस्मी उपचार-सी
हर लेती खुश्कियाँ, रुष्टियाँ फुहार-सी 
अब बस पुराने दिनों की धुंधली चुनौती

न माँ, न पिता, न बहन-भाई, भतीजे,
न माटी से उठते धूल-धूसरित किस्से,
न मंदिर की घंटी, न महफ़िल, न छुट्टी,
न मिठाई खाई, और चाय तक फीकी,
ऐसे में पुराने दिनों की धुंधली चुनौती

फिर लौट आऊंगा एक दिन मनाऊँगा होली,
पर क्या वो बचपन और जवानी सी होगी
न मैं वो हूँ, न प्रियजन हैं वैसे, हाय राम कैसे
फिर से बनाऊं वैसी अल्ल्हड़ उल्लास की टोली
क्या अजय रहेगी पुराने दिनों की धुंधली चुनौती ।



विवेक शर्मा
मार्च २०१३